आश्रम के निर्देशक प्रकाश झा ने कहा मैं समय के साथ चलता हूं, फिल्म बनाने के लिए सामाजिक विषय को चुनता हूँ

आश्रम: फिल्म निर्माता प्रकाश झा का कहना है कि उन्हें हमेशा प्रासंगिक फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया गया है. जो वास्तविक जीवन के मुद्दों पर पैदा हुई हैं. दामुल, मृत्‍युदंड, गंगाजल, अपहरान, परिक्षा जैसी फिल्‍मों के माध्‍यम से समाजशास्त्रीय विषयों का पता लगाने वाले झा ने काफी समय से समाज की नब्ज पर उंगली उठाई है.

एक साक्षात्कार में प्रकाश झा ने बताया कि हमेशा ऐसे लोग होंगे जो जो समाज और वास्तविक जीवन से संबंधित फिल्में बना रहे होंगे हैं. मैं समय के साथ चलता हूं और देखता हूं कि आसपास क्या हो रहा है. मैं फिल्म बनाने के लिए हमेशा सामाजिक विषय को चुनता हूँ. कहानी के संदर्भ में मैं जिस विषय को चुन्त्य हूँ वह वास्तविक जीवन से होता है. मैं पात्रों को दिलचस्प बनाने के लिए हर मुंकिन कोशिश करता और यही चुनौती होती है. यह मेरे लिए सौभाग्य था कि व्यावसायिक सिनेमा के अभिनेता मेरे साथ काम करने के लिए खुश थे.

दो बीघा ज़मीन और मदर इंडिया जैसे क्लासिक्स के उदाहरणों का हवाला देते हुए निर्देशक ने कहा कि सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि के खिलाफ स्थापित फिल्मों को अक्सर दर्शकों से अनुकूल प्रतिक्रिया मिली है. अगर कहानी दर्शकों को आकर्षित करती है. तो यह काम करेगा. एक समझदार दर्शक वह होता है जो सिनेमा को हर तरह से देखने के लिए तैयार होता है.

वेब श्रृंखला आश्रम-अभिनेता बॉबी देओल

उनकी नवीनतम कृति वेब श्रृंखला आश्रम अभिनेता बॉबी देओल द्वारा निभाई गई. इस वेब श्रृंखला में एक ‘गॉडमैन’ में जनता के अंध विश्वास की पड़ताल करती है. यह वर्तमान में एमएक्स प्लेयर पर स्ट्रीमिंग कर रहा है. झा का मानना ​​है कि अंध विश्वास दुनिया भर में प्रचलित है. चाहे वह भारत हो, अमेरिका हो या यूरोप हो. यह परियोजना एक विस्तृत कहानी के साथ शुरू हुई. मुझे यह दिलचस्प लगा. मैंने यहां एक सांठगांठ देखी. यहां तक ​​कि आम आदमी को उनकी (भगवानों की) जरूरत है. अपने दुख को उतारने की कोशिश की प्रक्रिया में उन्हें किसी की जरूरत होती है.

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दुर्भाग्य से, उनके पास सही लोगों के पास जाने के लिए समय, साधन और दृढ़ता नहीं है. इसलिए वे एक ऐसा क्वैक पाते हैं. जो कुछ भी नहीं जानता है. ये अपराधी दिमाग वाले लोग हैं. जो बाबाओं के रूप में काम करते हैं और लोग उनके के लिए किसी भी हद तक गिर जाते हैं. बॉलीवुड ने ओह माई गॉड और पीके जैसी फिल्मों के साथ अंध विश्वास की जगह ले ली है. लेकिन निर्देशक ने कहा कि आश्रम इसके उपचार में अलग है.

बोबी देओल ने एक पंथ के मृदुभाषी नेता बाबा निराला की भूमिका निभाई है. जो दलितों के उत्थान पर ध्यान केंद्रित करता है और कैसे वह अपनी निजी जरूरतों के लिए धर्म का दुरुपयोग करता है. पीके हो या ओह माय गॉड हो, इनमें बाबाओं को क्रिएचर माना गया है. लेकिन इस श्रृंखला में, भगवान के लिए एक दोहरे व्यक्तित्व का निर्माण किया है. जिसमें वह किसी को भी मारता है, बलात्कार करता है, झूठ बोलता है और चोरी करता है. लेकिन यह विश्वास के साथ करता है.

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